अफगानिस्तान सीमा पर पाकिस्तान लगातार मुश्किल का सामना कर रहा है। एक तरफ टीटीपी की ओर से पाकिस्तान में हमले हो रहे हैं तो वहीं अफगान तालिबान भी पाक को आंख दिखा रहा है। पाकिस्तान के एक्सपर्ट इस पूरे हालात के पीछे अमेरिका का दिमाग को मानकर चल रहे हैं।
हाइलाइट्स
- अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बढ़ रही है तनातनी
- पाकिस्तान को आंख दिखा रहा है अफगान तालिबान
- पाकिस्तान के एक्सपर्ट ने अमेरिका पर जताया शक
- इस्लामाबाद: पाकिस्तान को हलिया समय में अफगानिस्तान से लगातार झटके लगे हैं। टीटीपी को पनाह के मुद्दे पर दोनों देशों में तनाव इतना बढ़ा है कि पाक आर्मी ने अफगानिस्तान में हवाई हमले भी किए हैं। पाकिस्तान आर्मी ने अफगानिस्तान में पनाह पाए टीटीपी लड़ाकों को हमले में निशाना बनाने की बात कही है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खराब होती स्थिति पर पाक पत्रकार कामरान यूसुफ ने दिलचस्प और सनसनीखेज खुलासा किया है। कामरान का कहना है कि इस पूरे हालात के पीछे अमेरिका का दिमाग और पैसा हो सकता है। उन्होंने अपने इस दावे के सबूत के तौर पर सिलसिलेवार ढंग से चीजों को रखा है।
- कामरान यूसुफ कहते हैं, ‘अफगानिस्तान से अगस्त 2021 में जब अमेरिका निकला और तालिबान सत्ता में लौटा को पाकिस्तानी खुश हो रहे थे। हालांकि उस वक्त अफगानिस्तान में तैनात रहे एक सीनियर अमेरिकी सैन्य अफसर ने कहा था कि इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी देश को होगा तो वह पाकिस्तान होगा। उनका मानना था कि पाकिस्तान के खिलाफ काम करने वाले सशस्त्र गुट मजबूत होंगे और पाक में आतंकी हमले बढ़ेंगे। आज तीन साल बाद अमेरिका के उस जनरल की भविष्यवाणी सच साबित हुई है।’
‘अमेरिका मानता है पाकिस्तान को दगाबाज’
कामरान कहते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान के लौटने के बाद पाक आर्मी प्रमुख कमर बाजवा ने कहा था कि अमेरिका उस वक्त नाराज था। अमेरिका को तालिबान के सत्ता में लौटने की वजह पाकिस्तान लगा था। अमेरिका की इस नाराजगी को कम करने के लिए उस वक्त पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के उन लोगों को पनाह भी दी, जो अमेरिका के करीब थे और काबुल से भागकर आए थे।
कामरान ने आगे कहा, ‘बहुत से लोगों का ये भी मानना है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने डबल गेम खेली और इसका नतीजा ये निकला कि अमेरिका हारकर अफगानिस्तान से निकला। अमेरिका इसका बदला पाकिस्तान से लेना चाहता है और यही वजह है कि अंदरखाने अफगान तालिबान को लगातार वॉशिंगटन से मदद मिल रही है।
कामरान ने डोनाल्ड ट्रंप से उस बयान का भी हवाला दिया है, जिसमें उन्होंने बीते तीन साल में अरबों डॉलर अफगानिस्तान में भेजने की बात कही है। कामरान कहते हैं कि अमेरिका ने तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं है। तालिबान नेता उनकी वॉन्टेड लिस्ट में हैं और वो लगातार अफगानिस्तान में पैसा भेज रहे हैं। तीन साल में अगर 18 अरब डॉलर अफगानिस्तािन में आए हैं तो ये बताने की जरूरत नहीं वहां क्या चल रहा है।
अफगानिस्तान को अमेरिका से ये अरबों डॉलर मानवीय मदद के तौर पर मिले हैं। कामरान कहते हैं कि इतनी बड़ी रकम आई है और अफगानिस्तान में लोगों की हालत सुधरने की बजाय बिगड़ रही है। ये दिखाता है कि पैसा लोगों के लिए खर्च नहीं हुआ है। अब सवाल ये है कि इतनी बड़ी रकम कहां खर्च हो रही है। इस तरह के मजबूत दावे हैं कि ये पैसा आतंकी गुटों को पहुंच रहा है।
कामरान ने ये भी कहा कि अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़ते वक्त अपने खतरनाक हथियार भी वहां छोड़े। ये हथियार तमाम आतंकी गुटों के हाथ लगे। ऐसा लगता है कि ये जानबूझकर किया गया। ये भी कहा जाता है कि अमेरिका और तालिबान के बीच सत्ता बदलने से पहले ही बातचीत हो गई थी। अमेरिका लगातार इसके बाद भी तालिबान के संपर्क में रहा। अफगानिस्तान की ईरान, रूस जैसे देशों से सीमाएं देखते हुए अमेरिका ने तालिहान से संपर्क रखा है।
